संपादकीय
हमारा देश विभिन्न धर्म, जाति, भाषा संस्कृति वाला देश है जिसे हम अगर विविधताओं वाला देश कहें तो गलत नही होगा! तभी तो हर समूह के अपने हित और अपनी समस्यायें अलग-अलग हैं, और भारतीय राजनीति की बात करे तो इन हितों के बीच एक समानता बनाना भारतीय राजनीति की गले की हड्डी बना हुआ है ! मैं बात कर रहा हूं राष्ट्रीय एकीकरण की जिसका लोगों ने गलत मतलब निकालकर यह समझ लिया है कि सारी विविधताओं को खत्म करके पूरे देश में एक धर्म और एक भाषा लागू कर दी जाए! जबकि इसका मतलब जाति, धर्म, भाषा जैसी तमाम भिन्नताओं को इस तरह बनाये रखना चाहिए जिससे देश का अस्तित्व खतरे में ना रहे और दूसरी ओर यह भी ध्यान रखना होगा कि कोई व्यक्ति या समूह अपने लाभ और अपने समूह हित के लिए राष्ट्रीय हितों की इच्छा ना कर पाए। जो, इस समय देश में तेजी से चल रहा है! आरक्षण के नाम हर समूह एक लंबा आराम और नाम चाह रहा है, यह लोग राष्टीय एकीकरण को ताक पर रखकर यह भूल गए हैं कि राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ राष्ट्र हित है जो व्यक्तिगत समूह हितों से ऊपर है ! हमारे देश को आजाद हुए 65 साल होने जा रहे हैं, पर आजादी के ठीक पहले की बात करें तो स्वतंत्रता आंदोलन के समय पूरे देश में एकता का जो वातावरण था। वह इससे पहले और ना अभी तक देखने को मिला सभी का एक लक्ष्य था आजादी जिसके लिए सभी धर्मों, जाति क्षेत्रों के लोग एक होकर अपने मतभेदों को भलकर मरमिटने के लिए तैयार हो गए थे! पर आज इसका ठीक उलटा देखने को मिलता है देश की राजनीति ने व्यक्तिगत स्वार्थ और समूह स्वार्थ को बढ़ावा दे दिया है। इसका कारण यही है कि स्वतंत्रता के बाद जो राजनैतिक व्यवस्था की गई उसकी विशेषता राजनीति तंत्र में जन साधारण का सक्रिय रूप से भागीदार होना था! और यह समस्या इतनी बढ़ गई है की आज हम एकता और अखण्डता को बनाये रखने की बात करते है ! कारण यही है की राष्ट्रीय एकीकरण के ना हो पाने में बहुत सारे तत्व हैं, जो बाधक है, जैसे सम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयवाद आदि है, अगर हम सम्प्रदायिकता की बात करें तो एकीकरण की समस्या दो धर्मों दो जातियों के बीच प्रेम बढ़ाने से हल नहीं होगी बल्कि उन धर्मों के अंदर पाये जाने वाले छोटे समूह को एक करने से हल होगी वह इसलिए क्योंकि हमारे देश में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह मुसलमानों का है, और आज के दौर में हिन्दू और मुसलमानों में कई मुद्दों को लेकर तनाव रहता है, जिससे कई जगह दंगे हो रहे है जिससे जानमाल की हानि हो रही है। और देखा जाये तो जाति दूसरा मुख्य तत्व है, जिससे समाज में अनेक समूह हो गए है और नौबत यहां तक आ गई है कि अब संघर्ष छोटी और बड़ी जाति में ना होकर हर जाति में हो गया है। क्योंकि सबकि अलग-अलग दुनिया है और सब में होड़ लगी है कि ऐसे दौर की राजनीति में उन्हें कितना लाभ मिल सकता हैं । सोचने कि बात है लम्बा समय बीतने के बाद भी ऊँच-नीच का भेद भाव हमारे बीच पसरकर बैठा हुआ है।